नफ़रत की इंतहा!!

जब अपनापन कहीं हो जाए छू मंतर
नफ़रतभरी आँधियाँ बन जाए सफ़र
फिर सब कोशिशें हो जाती है बेअसर
शायद ऐसा ही होता है जीवन बसर।

जब नफ़रत का रिश्ता ही लगे प्यारा
सिर्फ़ माना,पहचान से जिन्होंने नकारा
फिर क्यूँ तलाशनी अब स्नेह की धारा
आओ महसूस करे ग़ैर रिश्तों का नज़ारा

गर अपना गीत ही गाएगा हर इंसान
औरों के मन की बात समझेगा कौन
ज़ख़्मों से भरा सीना है फिर भी मौन
दिल में दबी बातें पहुँचायेगा कौन?

क्या करें?

कोई तो हो जो दिखला पाए
अपने जीवन को आयना
वरना उम्र रफ़्तार से बढ़ती जाए
और इक दिन बीत जाए ना।

कभी समय छूटे तो कभी अपने
किस किस को संभाला करें
कभी संग चले ग़म तो कभी सपने
किस किस को यूँ समेटा करें।

चाहे तपती धूप हो या मधुर चाँदनी
किसे छोड़ें और किसे अपनायें
सफ़र है कि ढल रहा,छाने को रजनी
डर है कहीं झुलस ही ना जायें।

अपने खयालों संग मैं बस बढ़े जा रही
कैसे दिल से करूँ अलविदा इन्हें
ख़ुद को समझने की समझ ही नहीं रही
कैसे बदलूँ जिंदगी समझ के इन्हें।।

उम्मीद!

यादें बसी है दिल में बताऊँ कैसे
धुआँ धुआँ बन उठता है ग़ुबार,
नहीं आयेंगे फिर से वो दिन वैसे
भले करूँ चाहे उम्रभर मैं इंतज़ार।
लेकिन नादाँ दिल उम्मीद बँधाता है
और मुझसे रह रह कर कहता है,
बुरे दिन का भी बुरा वक़्त आता है
सब्र ही जीवन में ख़ुशहाली लाता है।

नव वर्ष की शुभकामनायें💐

पूर्ण हुए अरमानों का जी भरके जश्न मना पायें
नए जोश संकल्पों से अधूरे भी साकार कर पाये।

जीवन रोशन कर जाए फिर आशा की किरणें नई
नई मंज़िलें नित दिखलाए सबको उम्मीदें नई।

नई उमंगें लेकर आए जीवन में कई रंग नए
नई तरंगें भरकर जाए जीवन में संगीत नए।

हो चकनाचूर अहम,ये जीवन सरल बन जाये
ख़ुशहाली भरे आँगन में आओ सुख के चौक पुरायें।

राग द्वेष नफ़रत तजकर गर क्षमाशील सब बन जायें
फिर अपनी बनाई क़ैद से ख़ुद को भी मुक्ति मिल जाये।

समृद्ध रहे मन से सदा,समृद्धि घर घर फैलाए
स्वस्थ रहे तन मन सबके,प्रफुलित मन जग हो जाए।

ग़म के आँसू दूर करे ख़ुशियोंभरी अश्रु धाराएँ
ये साल जहां में ख़ुशियों का यूँ परचम फहराने आए।

हो जुनून और संकल्पों से भरी हुई फिर पहल नई
ख़ुशियों से सुसज्जित मुस्कान चेहरे पे हो हर पल नई।

नए दिन और नई रातें आए लेकर ये साल नया
सबके जीवन में भर जाए फिर से इक उल्लास नया।।

आस!!

अपने भी चल दे कभी छोड़ मझधार
पराए अपने बन लगायेंगे नैया पार
यही तो है इस जीवन का सार
ए दिल तू रखना उम्मीदें अपार!

छांव की क़ीमत ही क्या धूप बिन
कैसे बीते कोई दिन धूप-छांव बिन
बरसे ना निराशा हर पल छिन
ए दिल हर हाल में मस्त रहना हर दिन!

मुश्किलें देख कभी टूटे ना आस
हार जीत के खेले होंगे आसपास
काँटों संग ख़ुशबू के रहेंगे आभास
ए दिल तू कभी होना ना उदास!!

वो पनघट किनारे!!

जब मन पहुँचता अतीत में कभी
दिल रह रह कर सोचता है यही
तब ना होती थी कोई किटी पार्टी
ना नुक्कड़ बैठक थी औरतों की
जहाँ मिल जाती सखियों की टोली
साझा करने बातें कुछ दिल की।

क्यूँ ना समय चक्र पीछे ले जाए
वो पनघट हमें फिर से मिल जाए
जहाँ राह तकती सखियाँ पा जायें
और मन की बातें जी भर बतियायें
कुछ उनकी सुने,कुछ अपनी सुनायें।

जब भी ज़िंदगी की जद्दोजहद में
मन में ग़ुबार उठते हैं रह रह के
सब कुछ सखियों संग बाँट करके
पनघट पर गुल हो जाते पानी भरते
भले सर पे बोझ बढ़ता घर लौटते
लेकिन भीतर से हल्के हो जाते।

ये पनघट किनारे नुक्कड़ बन जाते
जहाँ हम रूबरू होकर सखियों से
फ़िक्र वही पर छोड़ के मुस्कुराते
मुश्किल सवालों के हल पा जाते
जो जीवन की उलझन सुलझाते ।।